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Tuesday, October 17, 2017 10:02:07 AM






Hindi Meri Hindi बागो में जब बहार आने लगे कोयल अपना गीत सुनाने लगे कलियों में निखार छाने लगे भँवरे जब उन पर मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! खेतो में फसल पकने लगे खेत खलिहान लहलाने लगे डाली पे फूल मुस्काने लगे चारो और खुशबु फैलाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! आमो पे बौर जब आने लगे पुष्प मधु से भर जाने लगे भीनी भीनी सुगंध आने लगे तितलियाँ उनपे मंडराने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे वायु भी सुहानी जब बहने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया Law And Order Essay In Urdu at ? धूप जब मीठी लगने लगे सर्दी कुछ कम लगने लगे मौसम में बहार आने लगे ऋतु दिल को लुभाने लगे मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे मान write my essay service desk वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !! काली घटा छाई है लेकर साथ अपने यह ढेर सारी खुशियां लायी है ठंडी ठंडी सी हव यह बहती कहती चली आ रही है काली घटा छाई है कोई आज बरसों बाद खुश हुआ तो कोई आज खुसी से पकवान बना रहा बच्चों की टोली यह कभी छत तो कभी गलियों में किलकारियां सीटी लगा रहे काली घटा छाई है जो गिरी धरती पर पहली बूँद देख ईसको किसान मुस्कराया संग जग भी झूम रहा जब चली हवाएँ और तेज आंधी का यह रूप ले रही लगता ऐसा कोई क्रांति अब सुरु हो रही. छुपा जो झूट अमीरों का कहीं गली में गढ़ा तो कहीं बड़ी बड़ी ईमारत यूँ ड़ह रही अंकुर जो भूमि में सोये हुए थे महसूस इस वातावरण को वो भी अब फूटने लगे देख बगीचे का माली यह खुसी से झूम रहा और कहता काली घटा छाई है साथ अपने यह ढेर सारी खुशियां लायी है. हे ईस्वर तेरी बनाई यह धरतीकितनी ही सुन्दर नए – नए और तरह – तरह के एक नही कितने ही अनेक रंग ! कोई गुलाबी कहतातो कोई बैंगनीतो कोई लाल तपती गर्मी मैं हे ईस्वरतुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स सीतल हवा बहाते खुशी के त्यौहार पर पूजा के वक़्त पर हे ईस्वरतुम्हारा पीपल ही तुम्हारा रूप बनता तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी नील अम्बर को सुनेहरा बनाते तेरे चौपाये किसान के साथी बनते हे ईस्वर तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी ह्बायों के रुख professional masters essay ghostwriting for hire for mba लगता है कि रुखसत हो जाएगी बरसात बेदर्द समां बदलेगा और आँखों से थम जाएगी बरसात. अब जब थम online essay helper url हैं बरसात तो किसान तरसा पानी को बो वैठा हैं इसी आस मे कि अब कब आएगी बरसात. दिल की बगिया को इस मोसम से कोई नहीं रही आस आजाओ तुम इस बे रूखे मोसम में बन के बरसात. चांदनी चादर बन ढक लेती हैं जब गलतफेहमियां हर रात तब सुबह नई किरणों से फिर होती हें खुसिओं की बरसात. सुबह की पहली किरण जब छू लेती हें तेरी बंद पलकें चारों तरफ कलिओं से तेरी खुशबू की हो जाती बरसात. नहा धो कर चमक जाती हर चोटी धोलाधार की जब पश्चिम से बादल गरजते चमकते बनते बरसात. प्रकृति सुन्दर रूप इस धरा का, आँचल जिसका नीला आकाश, पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक, उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज नदियों-झरनो से छलकता यौवन सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार खेत-खलिहानों में लहलाती फसले बिखराती मंद-मंद मुस्कान हाँ, यही तो हैं,…… इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार II. धरती माँ कर रही है पुकार । पेङ लगाओ यहाँ भरमार ।। वर्षा के होयेंगे तब अरमान । अन्न पैदा होगा भरमार ।। खूशहाली आयेगी देश में । किसान हल चलायेगा खेत में ।। वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ । हरियाली लाओ देश में ।। सभी अपने-अपने दिल में सोच लो । सभी दस-दस वृक्ष खेत help writing term paper literature review रोप दो ।। बारिस होगी फिर तेज । मरू प्रदेश का फिर बदलेगा वेश ।। रेत के धोरे मिट जायेंगे । हरियाली राजस्थान मे दिखायेंगे ।। दुनियां देख करेगी विचार । राजस्थान पानी से होगा रिचार्ज ।। पानी की कमी नही आयेगी । धरती माँ फसल खूब सिंचायेगी ।। खाने को होगा अन्न । किसान हो जायेगा धन्य ।। एक बार फिर कहता है मेरा मन । हम professional masters essay ghostwriting for hire for mba धरती माँ को पेङ लगाकर करते है टनाटन ।। “जय धरती माँ” विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है. यह प्रकृति कुछ कहना चाहती हैअपने दिल का भेद खोलना चाहती हैभेजती रही है हवाओं द्वारा अपना संदेशा। ज़रा सुनो तो ! जो वह कहना चाहती है। उसका अरमान ,उसकी चाहत है क्या ? सिवा आदर के वो कुछ चाहती है क्या ? बस थोड़ा सा प्यार ,थोड़ा सा ख्यालयही तो मात्र मांग है इसकीऔर भला वह हमसे मांगती है क्या ? यह चंचल नदियां इसका लहराता आँचलहै काले केश यह काली घटाओं सा बादलहरे -भरे वृक्ष ,पेड़ -पौधे और वनस्पतियांहरियाली सी साड़ी में लगती है क्या कमाल। इसका रूप -श्रृंगार हमारी खुशहाली नहीं है क्या? … है ताज इसका यह हिमालय पर्वतउसकी शक्ति-हिम्मत शेष सभी पर्वतअक्षुण रहे यह तठस्थता व् मजबूतीक्योंकि cheap write my essay impooving employee performance गर्व है यह सभी पर्वत। इसका यह गौरव हमारी सुरक्षा नहीं है क्या. यह रंगीन बदलते हुए मौसमशीत ,वसंत ,ग्रीष्म औ सावनहमारे जीवन सा परिवर्तन शील यहऔर सुख-दुःख जैसे रात- दिन। जिनसे मिलता है नित कोई पैगाम नयाक्या. इस प्रकृति पर ही यदि निर्भरता है हमारीसच मानो तो यही माता भी है हमारीहमारे अस्तित्व की परिभाषा अपूर्ण है इसके बिनाbuy essay online cheap lord of the flies jacks letter जीवनदायिनी व यही मुक्तिदायिनी है हमारी। अपने ही मूल से नहीं हो रहे हम अनजान क्या ?… हमें समझाना ही होगा ,अब तक जो ना समझ पायेहमारी माता की भाषा/अभिलाषा को क्यों न समझ पायेदिया ही दिया उसने अब तक अपना सर्वस्व ,कभी लिया नहींइसके एहसानोंउपकारों का मोल क्यों ना चूका पाये। आधुनिकता/ उद्योगीकरण ने हमें कृतघ्न नहीं बना दिया क्या ?… बाग़ में खुशबू फैल गईबगिया सारी महक गयी, रंग-बिरंगे फूल खिले, तितलियाँ चकरा गईं, लाल ,पीले ,सफ़ेद गुलाब ,गेंदाजूही ,खिले लाजवाबनई पंखुरियां जाग गयी, बंद कलियाँ झांक रही. चम्पाचमेलीसूर्यमुखीसुखद पवन गीत सुना रही महकते फूलों की क्यारीसब के मन को लुभा रही, धीरे से छू कर देखो खुशबूतुम पर खुश्बू लुटा रही, महकते फूलों की डाली, मन ही मन इतरा रहीहौले -हौले पाँव धरो, भंवरों की गुंजार बड़ी, ओस की बूंदे चमक रहींपंखुरिया हीरों सी जड़ी, सब को सजाते महकते फूलसब को रिझाते महकते फूल, महकते फूलों से सजे द्वार ,महकते फूल बनते उपहार ………… क्यूँ मायूस हो तुम टूटे दरख़्त क्या हुआ जो तुम्हारी टहनियों में पत्ते नहीं क्यूँ मन मलीन है तुम्हारा कि बहारों में नहीं लगते फूल तुम पर क्यूँ वर्षा ऋतु की बाट जोहते हो क्यूँ भींग जाने को वृष्टि की कामना करते हो भूलकर निज पीड़ा देखो उस शहीद को तजा जिसने प्राण, अपनो की रक्षा को कब खुद के श्वास बिसरने का उसने शोक मनाया है सहेजने को औरों की मुस्कान अपना शीश गवाया है क्या हुआ जो नहीं हैं गुंजायमान तुम्हारी शाखें चिडियों के कलरव से चीड़ डालो खुद को और बना लेने दो किसी ग़रीब को अपनी छत या फिर ले लो निर्वाण किसी मिट्टी के चूल्‍हे में और पा लो मोक्ष उन भूखे अधरों की मुस्कान में नहीं हो मायूस जो तुम हो टूटे दरख़्त…… ये सर्व वीदित है चन्द्र किस प्रकार लील लिया है तुम्हारी अपरिमित आभा ने भूतल के अंधकार को क्यूँ प्रतीक्षारत हो रात्रि के यायावर के प्रतिपुष्टि की वो उनका सत्य है यामिनी का आत्मसमर्पण करता है तुम्हारे विजय की घोषणा पाषाण-पथिक की ज्योत्सना अमर रहे युगों से इंगित कर रही है इला की सुकुमार सुलोचना नही अधिकार चंद्रकिरण को करे शशांक की आलोचना मैं निशि की चंचल सरिता का प्रवाह मेरे अघोड़ तप की माया यदि प्रतीत होती है किसी रुदाली को शशि की आभा तो स्वीकार है मुझे ये संपर्क जाओ पथिक, मार्ग प्रशस्त तुम्हारा और तजकर राग विहाग राग खमाज तुम गाओ मैं मार्गदर्शक तुम्हारी तुम्हारे जीवन के भोर होने तक. मेरी निशि की दीपशिखा कुछ इस प्रकार प्रतीक्षारत है दिनकर के एक दृष्टि की ज्यूँ बाँस पर टँगे हुए दीपक तकते हैं आकाश को पंचगंगा की घाट पर जानती हूँ भस्म कर देगी वो प्रथम दृष्टि भास्कर की जब होगा प्रभात का आगमन स्न्गिध सोंदर्य के pay to get university essay on usa और शंखनाद तब होगा घंटियाँ बज उठेंगी मन मंदिर के कपाट पर मद्धिम सी स्वर-लहरियां करेंगी आहलादित प्राण कर विसर्जित निज उर को प्रेम-धारा में पंचतत्व में विलीन हो जाएगी बाती और मेरा अस्ताचलगामी सूरज क्रमशः अस्त होगा यामिनी के ललाट पर. जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग तव शुभ नामे जागे तव शुभ आशिष मागे गाहे तव जय गाथा जन गण मंगल दायक जय हे भारत भाग्य विधाता जय हे जय हे जय हे जय जय जय जय हे अहरह तव आह्वान प्रचारित शुनि तव उदार वाणी हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी पूरब पश्चिम आशे तव सिंहासन पाशे प्रेमहार हय गाँथा जन गण ऐक्य विधायक जय हे भारत भाग्य विधाता जय हे जय हे जय हे जय जय जय जय हे पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथा युगयुग धावित यात्री, हे चिर-सारथी, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे, संकट-दुख-त्राता, जन-गण-पथ-परिचायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथे पीड़ित मुर्च्छित-देशे जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नत-नयने अनिमेष दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके स्नेहमयी तुमि माता, जन-गण-दुखत्रायक जय हे भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे रात्रि प्रभातिल उदिल रविछवि पूर्व-उदय-गिरि-भाले, गाहे विहन्गम, पुण्य समीरण नव-जीवन-रस ढाले, तव करुणारुण-रागे निद्रित भारत जागे तव चरणे नत माथा, जय जय जय हे, जय राजेश्वर, भारत-भाग्य-विधाता, जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे. – रवीन्द्रनाथ टैगोर (दिसम्बर 1911) नोट: इस कविता के प्रथ्म मुखड़े को भारत के राष्ट्र गान के रूप में स्वीकृत किया गया है| यह कविता मूल रूप से बांगला भाषा में लिखी गई है जिसका ये हिंदी अनुवाद है| कुछ शब्दार्थ कविता को सरलता से समझने हेतु, इस प्रकार हैं: अहरह: निरन्तर; तव: तुम्हारा; शुनि: सुनकर; आशे: आते हैं; पाशे: पास में; हय गाँथा: गुँथता है; ऐक्य: एकता; अभ्युदय: उत्थान; बन्धुर: मित्र का; धावित: दौड़ते हैं; माझे: बीच में; त्राता: जो मुक्ति दिलाए; परिचायक: जो परिचय कराता है; निविड़: घोंसला; छिल: था; अनिमेष: अपलक; करिले: किया; अंके: गोद में; प्रभातिल: प्रभात में बदला; उदिल: उदय हुआ. सालों बाद आज बहुत सालों बाद एक बार फिर मुझे अपनी कविताओं की याद आई और मैं लगा पलटने अपनी पुस्तक के पन्ने. पन्नों से निकल निकल कविताएँ मेरी कृतियाँ लगी कसने फब्तियाँ कहो कवि, कैसे हो? क्यों आई फिर हमारी याद इतने सालों के बाद? हमें कर पुस्तकबद्ध हो गये थे तुम निश्चिंत| शाश्वत नभ मे उँची उड़ान का, सपना मैने संजोया था आसमान वीरान नही था कुछ लोगो से परिचय भी था पर चीलो की बस्ती मे खुद को ही अकेला पाया था उत्तर गये, दक्षिण गये पूरब और पश्चिम भी गये अपने पुलकित पँखो को फैलाकर सारा जहाँ चहकाया था जीने की चाह मे जीवन् बीत चला अब अवशान की बेला आई सोच रही क्या खोया क्या पाया जो खोया वो मेरा ही कब था जो पाया मैने कमाया था क्षोभ नही इस अनुभव का मुझको मैं जो भी हूँ इसने बनाया है सोच रही हूँ घर हो आऊँ, नभ पे बादल जो छाया है कल्पनाओ की महज़ उड़ान थी, आँखे खुली, और ये क्या धूप निकल आया है. ये कैसा हूनर है तुम्हारा की बहते हुए को बचाकर सहारा देते हो और फिर बहा देते हो उसे उसी झरने में ये कहकर की वो इक नदी है और तुम फिर आओगे उससे मिलने उसका सागर बनकर फिर ये दूरियाँ ख़त्म हो जाएँगी ताउम्र के लिए नदी परेशान रही जलती रही, सुखती रही सागर की किस्मत में नदियाँ ही नदियाँ हैं उसे परवाह नही जो कोई नदी उस तक ना पहुँचे और भी नदियाँ हैं उसकी हमसफ़र बनने को एक सदी बीत गयी नदी के सब्र का बाँध आज टूट सा गया है नदी में बाढ़ आया है आज उसमे आवेग है, उत्साह है चली है मिलने अपने सागर से बहा ले गयी अपना सब कुछ साथ नदी सागर तट पर आ चुकी है कितना कुछ जानना है, कहना है तभी सागर ने पूछा कहो कैसे आना हुआ जम गयी वो ये सुनकर कुछ देर के लिए, पर अंदर की ग्लानि ने फिर से पिघला दिया नदी ने मौन रहना ही ठीक जाना सागर के करीब से अपना रुख़ मोड़ लिया और सोच रही है, ऐसे मिलने से तो बेहतर था वो अंतहीन इंतज़ार, जो उसे अब भी रहेगा चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम, मुरली की मीठी धुन बाजे, जहाँ प्रेम अविराम।। गैया, पाहन और कदम्बें, सबकी जहाँ एक ही बोली, छुपे जहाँ कण कण में मोहन, खोजत सब ग्वालन की टोली। जहाँ कृष्ण की शीतल छाया, बाकी जग है घाम, चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।१।। छलके जहाँ भक्ति रस ऐसे, मुरली की मीठी धुन जैसे, जहाँ गोपियाँ प्रेम मगन हों, भव-बन्धन छूटे ना कैसे, जहाँ रचाते हर पल कोई, लीला मोरे श्याम, चलो चलो साथी हिल-मिल कर, मनमोहन के धाम।।२।। आसमान की बाँहो मे प्यारा सा वो चाँद ना जाने मुझे क्यों मेरे साथी सा लग रहा है. खामोश है वो भी खामोश हूँ मैं भी सहमा है वो भी सहमी हूँ मैं भी कुछ दाग उसके सीने पर कुछ दाग मेरे सीने पर जल रहा है वो भी जल रही हूँ मैं भी कुछ बादल उसे ढँके हुए और कुछ मुझे भी सारी रात वो जागा है और साथ मे मैं भी मेरे आस्तित्व मे शामिल है वो सुख मे और दुख मे भी फिर भी वो आसमाँ का चाँद है और मैं……. जमी की हया !

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